जानें गर्भ संस्कार का महत्व और इसे शुरू करने की विधि

विश्व की सभी कलाओं में सर्वश्रेष्ठ कला है मातृत्व यह एकमात्र ऐसी कला है जिसमें एक नए जीव का निर्माण होता है हालांकि सभी स्त्रियों में ईश्वर ने यह कल जन्म के साथ ही प्रदान की है लेकिन उसे उजागर करके उत्कृष्ट के साथ संपूर्णता की ओर ले जाने की जिम्मेदारी ईश्वर ने हमें सौंपी हैं जिसके लिए आयुर्वेद में कुछ नियम दिए गए हैं जो मैं आपको बताऊंगी इन नियमों का सच्चे मन से पालन करने पर निश्चित ही आपके लिए मातृत्व का यह अनुभव जीवन का सर्वश्रेष्ठ अनुभव बन जाएगा

जब गर्भ संस्कार एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवनशैली हुआ करता था

पहले के जमाने में ज्यादातर संयुक्त कुटुंब प्रथम देखने को मिलती थी घर की बहू में और स्त्रियां घर के बड़ों के साथ रहते थे उनके देखरेख में रहते थे जिसे गर्भावस्था के दौरान खाने पीने पहनने उड़ने के बारे में सारी समझ और अनुभव ज्ञान घर की बुजुर्ग महिलाओं के द्वारा ही अगले पीढ़ी को मिलता रहता था इस तरह स्वस्थ शिशु के जन्म के लिए ज्ञान घर में ही मां सासु मां दादी मां और नानी मां से प्राप्त होता रहता था कहा जाता है कि पांचवे महीने से बच्चा गर्भ में सब सुनने के काबिल हो जाता है

क्या है गर्भसंस्कार?

आज की वर्किंग महिलाएं जो दिन के 8 से 10 घंटे ऑफिस या व्यवसाय में बिजी रहती हैं ज्यादातर कपल नौकरी या बिजनेस के कारण अपने पेरेंट्स से दूर रह रहे होते हैं ऐसी स्थिति में स्वस्थ संतान की उत्पत्ति का सटीक और अनुभवजन्य ज्ञान हमारे लिए दुर्लभ बन चुका है ऐसी स्थिति में ऋषियों की लिखे हुए शास्त्र और हमारे बड़ों के अनुभव के फल स्वरुप गर्भ संस्कार का यह ज्ञान हमें अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए लेकिन उससे पहले यह समझना जरूरी है कि गर्भ संस्कार बच्चे का बौद्धिक विकास गर्भ के अंदर से ही उसमें जागृत करने के लिए सहायक है

क्यों जरूरी है गर्भ संस्कार?

जैसे कुमार जानता है कि उसे कैसे आकर का घड़ा चाहिए जो चित्र उसकी कल्पना में है वह उसे साकार कर पता है हमें भी ऐसी कल्पना करने की कोशिश करनी चाहिए कि हमें जैसी संतान चाहिए वैसे ही हम उसे बना सके l प्राचीन समय के ऐसे कई प्रसिद्ध उदाहरण है जिसमें कई माता ने इच्छित गुणों वाले संतान प्राप्त किए हैं जो तब हो पाया है वह आज भी हो ही सकता है और आज के समय में ऐसा कर पाने का नाम ही गर्भ संस्कार हैl शिशु के जन्म से पूर्व माता-पिता की मेडिकल जांच करके उनके बीच को श्रेष्ठ बनाकर श्रेष्ठ गर्भ का निर्माण किया जा सकता है जिससे की प्रतिभाशाली स्वस्थ रोग मुक्त और उत्तम प्रतिरोधक क्षमता वाले संतान को जन्म दिया जा सके ऋषि मुनि द्वारा प्रमाणित यह चिकित्सा विधि या गर्भ विज्ञान ही आयुर्वेदिक गर्भ संस्कार है ऐसे गर्भ संस्कार के द्वारा हमारे भारत भूमि पर अवतरित श्रेष्ठ आत्माओं के कई उदाहरण हमारे सामने है जैसे कालिदास बढ़ भगवती महर्षि वेदव्यास जैसे पूरणकालीन महर्षि या हरिशंकर परसाई सुभद्रा कुमारी चौहान हरिवंश राय बच्चन रामधारी सिंह दिनकर सोहनलाल द्विवेदी मुंशी प्रेमचंद जैसे नामचीन कवि और लेखक है सचिन जैसा खिलाड़ी धीरूभाई अंबानी टाटा रतन जैसे बिजनेसमैन…….

गर्भ संस्कार का मतलब क्या है?

इसका मतलब है गर्भाशा में शुक्र और शोधित और जीवात्मा का जब संयुक्त होता है तो उसे गर्भ कहते हैं ऐसे गर्व पर किए जाने वाले संस्कार को गर्भ संस्कार कहते हैं गर्भ संस्कार का अर्थ है एक गुण को दूसरे गुण में बदलने की क्रिया को संस्कार कहते हैं आयुर्वेद शास्त्र की विशेषज्ञ यह है कि इस शास्त्र में पूरे 9 महीने के दौरान कौन से महीने में क्या विकसित होता है इसकी विस्तृत जानकारी दी गई है जैसे कि पंचमी मास में मां यानी कि पांचवे महीने में गर्भ में मां की उत्पत्ति होती है और छठवें महीने में बुद्धि का ओपन होता है इस विज्ञान को जान लेने के पश्चात उसके आधार पर आहार बिहार में बदलाव लाने से निश्चित ही इच्छित गुना वाले संतान की प्राप्ति हो सकती है l

गर्भ उत्पत्ति के लिए आवश्यक कारक

श्रेष्ठ संतान प्राप्ति के लिए चार मुख्य कारक बताए गए हैं

1-सही समय

2-स्वस्थ शरीर

3-पानी और आहार

4-श्रेष्ठ बीज

1.सही समय – स्त्री को मासिक धर्म आ जाने के बाद 12 से 18 दिन का समय गर्भधारण के लिए आदर्श माना जाता है यदि आपका मासिक धर्म चक्र नियमित है तो इस समय के दौरान त्रिभुज पुरुष बीच से फलित होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं यदि योग्य उम्र की बात करें तो स्त्री के लिए 18 से 28 वर्ष की आयु और पुरुष के लिए 22 से 30 वर्ष की आयु को संतान प्राप्ति के लिए आदर्श मन जाती है l

2. स्वस्थ शरीर – गर्भावस्थापन के लिए स्त्री का शरीर बीमारी मुक्त और स्वस्थ होना आवश्यक है गर्भावस्था के 9 महीने इसी गर्भ में शिशु का विकास होने वाला है इसलिए श्रेष्ठ संतान प्राप्ति के लिए गर्भाशय का स्वस्थ होना आवश्यक है गर्भाधान एक शोक स्त्री को गर्भाशय के ऊपर सूजन गर्भाशय ग्रीवा पर चले अत्यधिक सफेद पानी की समस्या अनियमित मासिक धर्म अत्यधिक मासिक स्त्राव या मासिक धर्म का बिल्कुल ना आना बीज ग्रंथि की कोई बीमारी होना फैलोपियन ट्यूब का बंद होना समय पर बी का अंडाशय से अलग ना हो पाना इत्यादि समस्याएं नहीं होनी चाहिए साथ ही टीवी डायबिटीज जैसी बीमारियों से रहित स्वस्थ शरीर का होना भी उतना ही आवश्यक है

3. पानी और आहार – माता को 9 महीना के दौरान विशेष रूप से पौष्टिक ताजा सात्विक और संतुलित आहार लेना चाहिए जिस की माता इन नौ महीना के दौरान अपने आहार बिहार का ध्यान रखते हुए एक स्वस्थ शिशु को जन्म दे पाए

4. स्त्री बीज और पुरुष बीच – श्रेष्ठ संतान प्राप्ति के लिए स्त्री बीज और पुरुष बीज दोनों ही श्रेष्ठ होने चाहिए आसमान गोत्र में विवाह करना उचित माना जाता है क्योंकि यदि समान गोत्र में स्त्री पुरुष का विवाह हो तो संतान में आनुवंशिक बीमारियां आने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं l

आयुर्वेद में शरीर शुद्धि के लिए पंचकर्म नामक एक विशेष चिकित्सा पद्धति उपलब्ध है जिसमें व्यक्ति की शारीरिक जांच की जाती है जिसके बाद उसकी प्रकृति वायु पित्त कफ के अनुसार अगर किसी बीमारी का निदान होता है तो उसके अनुरूप पंचकर्म चिकित्सा की सलाह दी जाती है बीमारी के अनुरूप पंचकर्म में से योग्य कर्म का चुनाव किया जाता है पंचकर्म के द्वारा शरीर से उन अशुद्धियों को निकाल दिया जाता है और शरीर को फिर स्फूर्तिला चेतन मन स्वस्थ और निरोगी बनाने के बाद स्वस्थ और उत्तम संतान की प्राप्ति हो सकती है

गर्भावस्था, जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि प्रकृति के द्वारा किया गया एक सुव्यवस्थित आयोजन है | बीच में उपस्थित उत्कृष्ट संभावनाओं को प्रकट करने की प्रक्रिया है– जन्म

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